Sunday, June 15, 2014

जिल्द


किताबों की जिल्द बदल दो
कि बड़ी ज़ोरों का तूफान आने वाला है...
जिल्द कमज़ोर रही तो उड़ जाएंगे ये पन्ने
फिर उनके सब शब्दों कि नुमाइश होगी
उन शब्दों के अर्थों को हर ओर उछला जाएगा
एक दूसरे पर नाहक ही चपोड़ा जाएगा
बेवजह दूसरों के मुंह मे ठूसा जाएगा
भावनाओं की सब और अर्थियाँ उठेंगी
और रचनाकार इस पागलपन के बीचों बीच
नंगा किया जाएगा...
और अगर नंगा हो गया रचनाकार तो
गिर जाएगा नकाब हर उस फरेब का जिसे सच के ठेकेदारों ने
सदियों से सहेजा है
पर इतना वीभत्स होगा उस सच का बेनकाब चेहरा
कि चीख पड़ेगी सारी सभ्यताएँ एक साथ
और ये भयंकर चित्कार बनेगी डंका एक नए महसंग्राम का
तो इससे बेहतर है कि ढका ही रहे सच का चेहरा
और कभी न नंगा हो कोई अनकहा इतिहास.....
ताकि कभी कुछ और न बदले किसी
भूत, भविष्य और वर्तमान मे,

किताबों कि जिल्द अब बदल दो......

7 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सुंदर अभिव्यक्ति !

सुशील कुमार जोशी said...

फालौवर्स गैजेट लगायें ताकि आपकी ब्लाग पर छपी पोस्ट की जानकारी मिलती रहे ।

moulshree kulkarni said...

gadget add kar diya hai.... sujhao hetu dhanyawaad...

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 19-06-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1648 में दिया गया है |
आभार |

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

Vaanbhatt said...

कभी न नंगा हो कोई अनकहा इतिहास...बहुत खूब ...

moulshree kulkarni said...

Bahut bahut dhanyawad